Wednesday, November 10, 2010
girls dress changing phase in our culture
कल जब मैं अपने बड़े भाई के साथ एक रेस्तरां में बैठी थी तभी कहीं से कुछ विदेशी लड़कियां वहां आयीं उनकी वेशभूषा कुछ इस प्रकार कि थी कि रेस्तरां में बैठा हर आदमी एक टक उनको देखे जा रहा था,मुझे उतना आश्चर्य नहीं हुआ क्यूंकि उनके देश का परिधान कि वैसा हैं ,परन्तु आश्चर्य मुझे तब हुआ जब मेरे ही देश कि लड़की को मैंने उनसे भी आधे कपड़ों में देखा,मुझे ताज्जुब होता है आजकल के माँ बाप पे कि वोह कैसी परवरिश दे रहे हैं अपने बच्चों को,पहले मांएं जैसे-जैसे बेटियां बड़ी होने लगती थी उनको घर के काम काज सिखाती थीं ,बताती थीं कि दुनियाँ बहुत बुरी है कपड़े सलीके से पहना करो,आज कल कि माताओं को फुर्सत नहीं खुद को हाई क्लास सोसाइटी कि दौड़ में शामिल करने से,माना आज ज़माना काफी एडवांस समाज पढ़ा लिखा है ,परन्तु पढ़ा लिखा समाज यह कब सिखाता है कि बेटी को बिना कपड़ों के घूमने कि छूट दो,विदेशियों कि नक़ल करने वालों को शायद यह खुद ही नहीं पता कि,यह विदेशी भी जब हमारे देश में आते हैं तो हमारी संस्कृति अपनाते हुए यहाँ कि वेशभूषा धारण करते हैं ,जबकि हमारे अपने कुछ लोग हमारी संस्कृति को उजाड़ने पे तुले हैं ,इस फैशन कि अंधी दौड़ में आज कि युवा पीढ़ी ऐसी उलझी हुए है कि इस गुत्थी को सुलझाना शायद नामुमकिन सा होता जा रहा है ,दुःख होता है आजकल के परिधानों को देखकर ,जो कभी शरीर छुपाने के काम आते थे आज दिखाने के काम आते हैं ,आपके सामने से अगर कोई ऐसी वेश भूषा में गुज़र जाये और आपके साथ आपके बड़े भाई या माँ बाप हो तो खुद शर्म से आँखे चुरानी पड़ती हैं,परन्तु यह युवा वर्ग बड़े गर्व से अपने बॉय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड के गले में हाथ डाले बड़े आराम से घुमते रहते हैं ,जैसे मानो दुनियाँ कि इन्हें कोई परवाह ही न हो, प्रश्न यह है कि क्या हमारी युवा पीढ़ी कभी समझ पायेगी देश के परिधानों के महत्त्व को..........
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