मैं अर्थात अहम् अहंकार ,मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु " मैं ",पचीन परंपरा रही है कि हिन्दू परिवारों में संयुक्त परिवारों का प्रचलन था जिसमे परिवार का बुजुर्ग घर का मुखिया होता था जो कि परिवार के बाकी सदस्यों का उत्तरदायित्व उठाता था ,परिवार का हर सदस्य अपनी भूमिका बहुत ही सुन्दर तरीके से निभाता था ,सभी सदस्यों में प्रेम एवं त्याग कि भावना का समन्वय था ,सयुंक्त परिवार के बहुत से फायेदे थे छोटों कि पर्वर्रिश बड़ो के प्रेम वृछ तले होती ,कितनी खुशियाँ एक साथ एक ही छत के नीचे मिलती,अच्छा लगता बड़ों का डांटना भी ,एक सभ्य समाज के निर्माण में भी संयुक्त परिवारों का अच्छा ख़ासा योगदान रहा है क्यूंकि एक अच्छे नागरिक का जन्म एक अच्छे सभ्य परिवेश में होता है ,परिवार के सदस्य ही एक बच्चे को अच्छे बुरे एवं सही गलत कि शिक्षा देते हैं ,परन्तु आज ये परिवार समाज से विलुप्त से हो गए हैं,पता नहीं क्यूँ लोग अपने उत्तरदायित्वों से मुंह चुराने कि कोशिश करते रहते हैं ,परिवार में बड़ों आशीर्वाद देव तुल्य माना गया है अगर बड़ों का साया सर है तो बड़ी से बड़ी मुशिकिलों को भी पार किया जा सकता है ,परन्तु आज आधुनिकता का पिशाच परिवारों कि शांति भंग कर चूका है,हर मनुष्य हर समय कभी विषाद कभी उच्च रक्त चाप जैसी रोगों से छोटी सी आयु में ही जूझना शुरू कर देता है ,सच में बहुत याद आता है वो दादी -नानी को छेड़ना उनकी झुर्रियों वाली खाल का सदा आलू बनाना घर में सब भाई बहनों का इकठ्ठा होकर मस्ती मारना ,जीवन में आत्म सुख के लिए हम कितना अमूल्य सुख खो चुके हैं कभी सोचा है. नहीं ना सच है नहीं सोच सकते क्यूंकि ,हमारे पास समय हही नहीं है .आज एकाकी परिवार परंपरा कितना सुख दे पाती है माँ बाप जब काम पे जाते हैं बच्चे किसे सौंप कर जाएँ यह बहुत बड़ी समस्या सामने आती है ,क्या गारंटी है कि जिस किसी को भी यह उत्तर्रदयित्व वोह सौंपेंगे उसकी नीगरानी में वोह सुरच्छित रहेंगे और अच्छे संस्कार ही सीखेंगे ,इन सारी चीज़ों के नुकसान किसका है ,एक प्रश्न है मेरा यह "मैं" "अहम्" किसका हित कारी रहा है जो हम इसे त्याग नहीं सकते ,जहाँ "मैं" का समावेश होता है वहां "हम" कि भावना का कोई स्थान नहीं ,यह "मैं" है जो हमें सुखों से दूर करता है जानते हुए भी इस "मैं" का इतना महत्व क्यूँ है हमारे जीवन में....................
अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
अर्थात
यह तेरा है यह मेरा है ,ऐसी सोच संकुचित एवं तुच्छ बुद्धि के लोगों में होई है ,जो समझदार एवं ज्ञानी मनुष्य हैं, उनके लिए तो पूरा विश्व उनका कुटुंब है!
nice post with good thoughts
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